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Sunday, May 12, 2019

Gautem Buddha About Full History

                        Life Of Gautam Buddha



buddha biography
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जन्म और वंश (Birth and Parentage)

महात्मा बुद्ध जी का बचपन का नाम सिद्धार्त था, उनका जीवन 567 ईं: पू:लुंबिनी मे विशाख की पूर्णिमा को हुआ था, उनके पिता का नाम शुद्धोधन था शुद्धोधन का राज आधुनिक नेपाल की तराई मे है उस की राजधानी कपिल वास्तु है ये शाक्य सूरज वंशि कषत्रिअ साथ सम्बन्ध रखते थे इनका गाउत Gautam है यही कारण है की  बुद्ध को गौतम के नाम से जाना जाता है महात्मा बुद्ध की माता जी का नाम महा माइया, जो की गोरखपुर जिले की Ganraaj anjan की राजकुमारी थी बोधी कथाओ के अनुसार एक रात महात्मा बुध की आत्मा ने सफेद हाथी के रूप में रानी के पेट मे प्रवेश किया ज्योतषीऔ के पूछे जाने पर पूछे जाने पर पता लगा की यहाँ एक महान आत्मा का जनम होने वाला है उसके एक साल के  बाद रानी गर्भ से हुई बच्चे के जनम से पहले राजे से अपने घर जाने की आज्ञा मांगी रस्ते मैं वो लुंबिनी बाग़ मे रुके यहाँ उनको पीड़ा होनी शुरू हुई और उसने गौतम को जनम दिया इस लिए महा माया को कपिल वास्तु लाया गया यहाँ पर गौतम के जन्म सातवे दिन ऊनिकी माता की मौत हो गई थी so उनका पालन-पोषण उनकी मासी (प्रजापति गौतमी) ने किया जनम के सम्बन्ध ही अजीबो गरीब भविष्यवाणिया हुई Asit नाम के ज्योत्षी ने कहा की या तो यह बालक चक्रवर्ती राजा बनेगा या कोई महान धार्मिक पुरश


बचपन और शादी  (Childhood and marriage)


शुरू से ही शुद्धोधन के पालने पर बहुत ध्यान दिया उसने उनको कभी भी दुखी नहीं रहने दिया उसने हुक्म कर   दिए की राजकुमार कोई भी अप्रिय जीव न देखे इतना सब कुछ होने के बाद राज कुमार फिर भी बहुत ही गंभीर रहता था वो सिर्फ जन्म-मरन के विषय पर ही सोचता रहता था शुरू से ही वे पशु पक्षिओ के प्रति दया भावना रखते थे. गौतम का मन संसार के कामो मे  लगाने के लिए उसके पिता ने उनकी 16 साल की उम्र में शादी कोलिया गणराज की बहुत सुन्दर राजकुमारी यशोध्रा के साथ की उसके घर राहुल (बंधन) नाम के राजकुमार ने जन्म लिया पर घरशिति जीवन उसके जीवन मैं रुकावट न बन सका 

चार महान दृश्य(Four Great Sights) 

गौतम बुद्ध के जीवन असली change लाने वाले चार महान दृश्य थे उनके ही कारण वे अपने मार्ग निश्चित कर  सके कहते है की वो गुप्ती एक रथवान channa के साथ चार वार शहर देखने गए उन्होंने एक बूढ़ा आदमी,रोगी,मृत्यु शरीर और एक संस्यासी को देखा पर पहले 3 दृश्य ने उनके मन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा. उसने देख लिया की संसार दुखो का घर है. पर उस सन्यासी को देख क्र उनका दिल बहुत खुश हुआ उसका जीवन उनको आदर्शमय लगा. सो उन्होंने फिर घर छोड़ने का फैसला लिया।

महान ग्रह त्याग (The great renunciation)

गौतम का मन बहुत दुखी रहने लगा वे घर बार सब कुछ छोड़ना चाहते थे पर उनको अपनी पत्नी और अपने बच्चो  का विचार आया आखिर एक रात वे अपनी पत्नी और बच्चे को सोते हुए छोड़के सच के खोज मे निकल गए. उस समय उनकी उम्र 29 साल की थी बुद्ध  धर्म में इस घटना को महान त्याग कहा गया है

ज्ञान प्राप्ति (Enlightenment )


घर छोड़ने के बाद वे राज ग्रह गए वह पर उन्होंने 2 ब्राहमण सन्यासी Alar-klaam और Udrak ramputar से दर्शन शास्त्र का ज्ञान प्राप्त हुआ पर उनको कोई भी शांति नहीं मिली इस से वे 5 शिष्य ले के उरुबला के जंगलो में चले गए वहा पर उन्होंने 6 साल तक घोर तपस्या की वे सुख के कांटा बन गए थे पर सच्चा ज्ञान उनको अभी भी नहीं प्राप्त हुआ वे इस सीटे पर पहुँच गए व्रत वगेरा बेफाईदा थे. इस से उनके 5 चेले नराज होके चले गए। अब वे गौतम अकेले ही Gya  की तरफ चले गए. वहा पर वे निरजला नदी के पास एक पीपल के वृक्ष निचे बैठ के चिन्तन करने लगे उन्होंने यह पका फैसला ले लिया था की  जब तक उनको ज्ञान प्राप्ति नहीं होती तब तक वे यहाँ से  हटेंगे वे पूरे सात दिन तक अखंड समाधि में लीन रहे वैसाख की पूर्णिमा वाले दिन उनको सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई उस समय उनकी उम्र 35 साल की थी 

धर्म प्रचार (Preaching work)

ज्ञान प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध  अपने ज्ञान का प्रचार करना शुरू किया उन्हने अपना पहला उपदेश अपने पुराने 5 चेलो को दिया  इस घटना को बुद्ध धर्म में धर्मचक्र परिवर्तन कहा गया है सारनाथ के बाद बुद्ध ने और कई जगहों पर जाना शुरू किया उन्होंने मगध के राजगृह,कपिलवस्तु etc. जगह पर जाके अपने धर्म का प्रचार किया उन्होंने मगध मे बुद्ध धर्म की नीह रखी. होली-होली  मगध के राजा और परजा सब उनके चेले बन गए. उनके पिता,पत्नी और पुत्र ने भी उनका धर्म स्वीकार कर लिय। उनके चचेरे भाई को उनसे बहुत नफरत हुई कई वार तो उन्होंने उनको मरवाने की कोशिस की, पर कोशिस नाकाम रही. लेकिन वे अपने धर्म प्रचार मैं लगे रहे.

महा परिनिवार्ण (Maha Parinivarn) 


महात्मा बुद्ध 45 साल तक महान  प्रचारक मैं रूप में काम करते रहे.वे आखरी समय महा प्रचारक करते हुए Pawa  पहुंचे।वह पर उनको पेचिस के रोग लग गए. इसके बाद वे कुशीनगर  पहुंचे 487 ई:पू: विशाख की पूणिमा के दिन ऊनहोने अपना शरीर छोङ दिया, उस समय उनकी ऊमर 80 साल की थी बूध धम॔ मे इस घटना को महा परीनिवारण कहा गया है।

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